सुना था कि मेरे पूर्ववर्ती साहब तो सब्जियाँ बाजार में बेच भी देते थे। मैंने यह बात सुनकर माधुरी से कहा था—
“देखो, अगर नौकरी न रही तो कम-से-कम आलू-टमाटर बेचकर गुजर-बसर हो जाएगी!”
आँगन में आम, अमरूद, कटहल, लीची के पेड़ों की भरमार थी। मेरे पिता जी उन दिनों अधिकतर हमारे साथ ही रहते थे। सुबह-सुबह वे लॉन में टहलते और उनके पीछे-पीछे हमारा पालतू स्पिट्ज कुत्ता “फरी” ऐसे चलता जैसे कोई सिक्योरिटी गार्ड ड्यूटी पर हो।
उसी दौरान मैंने एक बूढ़े विशाल चील को कई बार लॉन के पास टहलते देखा। वह इतना बूढ़ा था कि उड़ भी नहीं पाता था। मैंने मजाक में माधुरी से कहा—
“असल मालिक तो यही चील है। हम तो बस रिटायरमेंट तक के शरणार्थी हैं!”
एक दिन मैं लंच के लिए घर आया। माधुरी बड़े रहस्यमय अंदाज़ में बोली—
“चलो, तुम्हें कुछ दिखाती हूँ।”
मैं पीछे गया तो देखता क्या हूँ—एक गर्भवती गाय खड़ी है!
मैं चौंक गया—
“अरे! यह कहाँ से आयी? क्या BHEL ने अब डेयरी प्रोजेक्ट भी शुरू कर दिया?”
माधुरी बोली—
“बेचारी गेट के पास खड़ी होकर रंभा रही थी। दया आ गई। मैंने मालियों से कहा अंदर ले आओ।”
गाय को ताजी सब्जियाँ, पानी, पूरा VIP ट्रीटमेंट मिलने लगा। लेकिन घर में एक सदस्य इस व्यवस्था से बिल्कुल खुश नहीं था—हमारा फरी।
फरी का चेहरा ऐसा रहता जैसे किसी विभाग में उसका ट्रांसफर कर दिया गया हो।
वह गाय को देखकर लगातार भौंकता—
“यह मेरा इलाका है! तुरंत खाली करो!”
गाय शांत भाव से जुगाली करती रहती। उसे फरी की राजनीति से कोई फर्क नहीं पड़ता था।
एक हफ्ता बीत गया। कोई मालिक नहीं आया। फिर एक रात गाय ने बछड़े को जन्म दिया। पूरा ऑपरेशन माधुरी की देखरेख में हुआ और मेरे प्रिय सहकर्मी बुनियाद ने ऐसे जिम्मेदारी संभाली जैसे वह किसी सरकारी प्रोजेक्ट का commissioning in-charge हो।
मैंने बुनियाद से कहा—
“तुम्हारी capability देखकर लगता है BHEL के बाद veterinary department भी संभाल लोगे।”
बुनियाद हँस पड़ा।
माधुरी तो उस गाय और बछड़े से भावनात्मक रूप से जुड़ गई थी। लेकिन फरी की हालत खराब थी। अब तो attention का पूरा बजट ही कट गया था। वह मुझे देखकर शिकायत भरी आँखों से मानो कहता—
“साहब, पहले मैं घर का इकलौता बच्चा था!”
कुछ दिनों बाद एक गाँव वाला आया और बोला कि गाय उसकी है। बुनियाद ने पूरी तहकीकात की, गाँव में खबर भिजवाई, तब जाकर पुष्टि हुई कि आदमी सच बोल रहा है।
माधुरी गाय को जाने देना नहीं चाहती थी। उसकी आँखें नम थीं।
मैंने कहा—
“देखो, असली मालिक के पास लौटना ही ठीक है। वरना कल को गाय भी बोलेगी कि मेरा transfer order cancel कर दो।”
गाय चली गई। बछड़ा भी साथ गया।
हम सब थोड़े उदास थे।
लेकिन फरी…
वह उस दिन इतने गर्व से लॉन में घूम रहा था जैसे उसने कोई लंबी कानूनी लड़ाई जीत ली हो।
इस तरह कुछ दिनों के लिए ही सही, हमारे “अपनी गाय” रखने का सपना पूरा हुआ—और फरी ने राहत की साँस ली।

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